Posts

सच्चा मित्र कौन?

 धैर्य। सुख में दुख में। सम में विषम में। धैर्य है तो हर विपत्तियां उससे टकराकर लौट जाती हैं। ज्यादा नुकसान नहीं होता हमारा। कम से कम मानसिक स्थिरता बनी रह जाती है। तो हम खुद के साथ साथ अन्य को भी संभाल लेते हैं। फिर समय का चक्र घूमता है। परिस्थितियां विषम से सामान्य होने लग जाती हैं। स्वास्थ्य के साथ- साथ स्वभाव की भी रक्षा हो जाती है और इस धैर्य के कारण ही अंततः हम योद्धा बनकर उभरते हैं। जीत हुई हो या हार हमारे धैर्य और उससे उत्पन्न सूझबूझ की भूरी- भूरी प्रशंसा होती है। साथ ही, अन्य के लिए आप एक प्रेरक एवं अनुकरणीय उदाहरण बन जाते हैं। एक छोटी सी बानगी भर है ये धैर्य की। बाकी इसे अपनाकर और विषम परिस्थितियों में रखकर इसके अनुपम व अगणित लाभ को  स्वयं ही अनुभव किया जा सकता है। हमें बस इतनी - सी सतर्कता रखनी पड़ती है कि हमें धैर्य रखनी है, घबराना या हड़बड़ाना नहीं है या कोई असामान्य नहीं करनी किसी के साथ। बस! इति!!

क्या आज क्या कल! सत्य अटल!!

 कहते हैं हमेशा आज में जियो। आज में भी वर्तमान में।क्योंकि एक कल बीत चुका और दूसरा आने वाला है। दोनों में कोई भी अपने वश में नहीं। लेकिन अनुभव कहता है कि आज अर्थात् वर्तमान पर किसी का वश नहीं। यह बीते कल का परिणाम मात्र है जिसके वशीभूत हो हम चाहा - अनचाहा करते चले जाते हैं। महत्व है चैतन्य अर्थात् जागरण एवं सतर्कता का जिससे हमें भवितव्यता का आभास हो उठता है। फिर अगली भूमिका है साहस एवं पुरुषार्थ की जिसके दम पर हम वर्तमान में होने वाली घटना को विवेक एवं धैर्य से परख कर उसमें आवश्यक सुधार कर सकने में समर्थ हो पाते हैं। पर अंततः दैव इच्छा पर निर्भर करती है कि उन्होंने जो पूर्व निर्धारित कर रखा है उसमें उन्हें हस्तक्षेप पसंद है कि नहीं। यहां पर गुरु की भूमिका का पता चलता है जो हमारे कल्याण के लिए दैव निर्धारण में हस्तक्षेप करने का सामर्थ्य रखते हैं और भाग्य को लिखने वाला भी इस हस्तक्षेप को सहज स्वीकार कर लेते हैं। हमारी भूमिका बस इतनी सी है कि हम उनकी सत्ता को स्वीकार कर उनको समर्पित हो धैर्य एवं विश्वास के साथ रहें। असत्य का त्याग एवं सत्य को ग्रहण करने का साहस कर सकें। इस तरह आज की स...