सच्चा मित्र कौन?
धैर्य। सुख में दुख में। सम में विषम में। धैर्य है तो हर विपत्तियां उससे टकराकर लौट जाती हैं। ज्यादा नुकसान नहीं होता हमारा। कम से कम मानसिक स्थिरता बनी रह जाती है। तो हम खुद के साथ साथ अन्य को भी संभाल लेते हैं। फिर समय का चक्र घूमता है। परिस्थितियां विषम से सामान्य होने लग जाती हैं। स्वास्थ्य के साथ- साथ स्वभाव की भी रक्षा हो जाती है और इस धैर्य के कारण ही अंततः हम योद्धा बनकर उभरते हैं। जीत हुई हो या हार हमारे धैर्य और उससे उत्पन्न सूझबूझ की भूरी- भूरी प्रशंसा होती है। साथ ही, अन्य के लिए आप एक प्रेरक एवं अनुकरणीय उदाहरण बन जाते हैं। एक छोटी सी बानगी भर है ये धैर्य की। बाकी इसे अपनाकर और विषम परिस्थितियों में रखकर इसके अनुपम व अगणित लाभ को स्वयं ही अनुभव किया जा सकता है। हमें बस इतनी - सी सतर्कता रखनी पड़ती है कि हमें धैर्य रखनी है, घबराना या हड़बड़ाना नहीं है या कोई असामान्य नहीं करनी किसी के साथ। बस! इति!!
Comments
Post a Comment