क्या आज क्या कल! सत्य अटल!!

 कहते हैं हमेशा आज में जियो। आज में भी वर्तमान में।क्योंकि एक कल बीत चुका और दूसरा आने वाला है। दोनों में कोई भी अपने वश में नहीं। लेकिन अनुभव कहता है कि आज अर्थात् वर्तमान पर किसी का वश नहीं। यह बीते कल का परिणाम मात्र है जिसके वशीभूत हो हम चाहा - अनचाहा करते चले जाते हैं। महत्व है चैतन्य अर्थात् जागरण एवं सतर्कता का जिससे हमें भवितव्यता का आभास हो उठता है। फिर अगली भूमिका है साहस एवं पुरुषार्थ की जिसके दम पर हम वर्तमान में होने वाली घटना को विवेक एवं धैर्य से परख कर उसमें आवश्यक सुधार कर सकने में समर्थ हो पाते हैं। पर अंततः दैव इच्छा पर निर्भर करती है कि उन्होंने जो पूर्व निर्धारित कर रखा है उसमें उन्हें हस्तक्षेप पसंद है कि नहीं। यहां पर गुरु की भूमिका का पता चलता है जो हमारे कल्याण के लिए दैव निर्धारण में हस्तक्षेप करने का सामर्थ्य रखते हैं और भाग्य को लिखने वाला भी इस हस्तक्षेप को सहज स्वीकार कर लेते हैं। हमारी भूमिका बस इतनी सी है कि हम उनकी सत्ता को स्वीकार कर उनको समर्पित हो धैर्य एवं विश्वास के साथ रहें। असत्य का त्याग एवं सत्य को ग्रहण करने का साहस कर सकें। इस तरह आज की सम विषम परिस्थितियों के बीच उज्ज्वल भविष्य की स्थापना की जा सकती है जो उसी स्तर की आत्मा को हमारी भावी पीढ़ी के रूप में आने को आकर्षित करेगी वहीं पूर्वज भी तृप्त होंगे और गौरवान्वित अनुभव करेंगे कि हमारा वंशज सत्य से प्रकाशित मार्ग पर है। इति!

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